बूंद

सुनो, और उस पल में ज़िन्दगी की रफ्तार सांसों और धड़कनों को पीछे छोड़ती,
जब मैं पानी तो बन जाती है, भंवर
और जब मैं हवा तो, बबंडर
कितना चाहती हूँ मैं उस पल तुम्हें, क्योंकि यहां मुझमें घुल सा जाता है, तुम्हारे अंदर का कौन,
कैसे समेट लेती हूँ तुम्हें, जैसे तुमने दरवाजे पर दस्तक दी, और बस एक खटखटाहट के साथ किबाड़ बंद, तुम भीतर, बस सांसें और सन्नाटा ।
यहां तुम बिना भय, बिना शर्त, जैसे बस खुद को खोने ही आये थे, तपती मिट्टी में बस एक बूंद गिरने भर।
बहुत ओछा लगने लगता है, तुम “बूंद” का प्रवाह
यहां मेरा हर कोना भर जाता है, ममत्व से, वात्सल्य से
मैं खुद को महसूस करती हूँ कितना बृहद, असीमित, घास की एक कोपल सा, और तुम नन्ही एक बूंद फिर मेरी बाहों में, कभी कंधे पर, कभी गोद में।
तुम्हें बस दुलारती हूँ, नज़र भर देखती हूँ, तुम्हारा माथा चूमती हूँ।
और अभिव्यक्त कैसे करूँ, कितना चाहती हूँ, मैं उस पल तुम्हें।
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तुम कुछ मत कहना
तुम्हारी दीप्ति

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तुमसे दूर!!

है बस आंखे बंद करके शांत अंधेरे की गहराई पर
एक सांस भरते कदम की गिनती पर
सूरज से पहली किरन फूटने के अंतराल पर
चांदनी को चाँद छूने की आतुरता पर
जितनी पत्तों कोपलों के बीच से चलती हवा की सरसराहट
या भुरभुरी मिट्टी भरी पगडंडियों में चलते कदमों से लिपटी धूल को मिली मोहलत
तुमसे दूर होना भी कुछ ऐसा ही..
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तुम्हारी दीप्ति

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कभी कभी

“अब प्रेम की बात छेड़ ही दी है तो,
कभी कभी जैसे शब्द,प्रेम में नहीं आते!
ये तो तलब है, चाह कर, न चाह कर !!

😍😍दीप्ति

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इमोशनली डाउन :)

लिखने बैठी थी कुछ ! पता नहीं क्यों बातें, अधूरी लगतीं हैं, जब तक कुछ लिख न दूँ तुम्हारे लिए ! तुम पढ़ कर क्या सोचते हो, वहां तक कभी सोचा नहीं मैंने ! शायद स्वार्थी हूँ यहाँ, इस जगह, बस अपने लिए सोचती हूँ, लिख रही होती हूँ जब तुम्हारे लिए, क्यूंकि अभिव्यक्ति का माध्यम है, ये मेरे लिए और तुम्हें एकात्म करने की जगह भी! जहाँ तुमसे दूर हो कर भी, मैं तुम्हें अपने भीतर सहेज पाती हूँ ! क्यूंकि, लिखते हुए, मैं तुम्हारे मन, तुम्हारी सांसों की तह तक जा पाती हूँ, और बदले में खुद बिखर जाती हूँ, उतने ही रेशों में, जितनों से तुमने अपनी जिंदगी को बुना होगा!
सब कुछ दूर है, मेरी पहुँच से बाहर, मैं पार करना चाहती हूँ, मेरी दुनिया से, तुम्हारी दुनिया तक की दूरी, मुश्किल नहीं लगता कुछ, क्यूंकि सब कुछ मुझे मेरे आस पास ही लगता है,सब मुझसे जुड़ा हुआ, और जैसे, सब घटित हो रहा हो मेरे साथ!
कुछ डर भी उपजते हैं खरपतवार से मन में! स्वभाव ,परिस्थितियां विपरीत, पर तब भी मन एक ही शिरोबिंंदु से चलता नज़र आता है, तुम्हारा- मेरा ! और शायद तभी तुम पढ़ लेते हो मुझे, तब भी जब कुछ लिखती नहीं हूँ मैं!

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इमोशनली डाउन 🙂
तुम्हारी दीप्ति

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नाव अ डेज़ “आजकल “

जो तुम्हारे बुरे वक़्त में काम आये, जब तुम्हें उसकी सबसे ज्यादा ज़रुरत हो, वो तुम्हारे साथ हो, वो तुम्हारा अपना!! अब अपनों की परिभाषा बदलने सी लगी है! जिसकी प्रोफाइल स्क्रीन पर तुम्हारे भेजे हुए व्हाट्सएप मैसेज पर दो नीले टिक तुरंत आ जाये, और मैसेज पढ़ कर जो तुरंत रिप्लाई कर दे, उस से अपनेपन का रिश्ता अपने आप बनाने लगता है !!
जिसके मैसेज बॉक्स में तुम्हारा मैसेज दो तीन दिन तक पड़ा रहे बेरंग टिक के, वहां अपनेपन की जड़ें सूखने सड़ने लगतीं हैं 🙂 और उसे डिलीट फॉर आल एंड फॉर एवर कर देना ही जायज़ है!

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मुफ्त का ज्ञान 🙂 🙂

दीप्ति

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किनारे ! नौवा पन्ना !

आज लिखने बैठी, उस सूखी नदी सी,
जिसे तुमने किनारों में बाँट दिया था,
और अलग कह दिया था, सामानांतर चलते एक तुम और एक मुझ में!
ये वही नदी , जिसकी ऑंखें आवेग रहित, नीरस
मन, भावहीन,निर्लज्ज, इतना हठीला
साँसे,उठती थमती, भरभराती रेत सी,
कि कोई मान बैठे मरुस्थल इसे!!
कल कल छल छल, प्रसन्न दिखता प्रवाह, उस समय ही,
बहुत कुछ बहा ले गया था, जो किये था स्मृतियों को सपाट
पर जानते हो, उस वक़्त भी बनी थी खाइयां, नदी के तल में,
कि निर्जल नीरस दिनों में भी,
स्पर्श करते रहें किनारे, बाँहों में भर,
भरभराकर तुम मुझ में गिरो, तो समेट लूँ इन्हीं खाइयों में तुम्हें !
बबंडर कुरेद कर उड़ा ले जाये जो मेरी रेत,
तो रोक लो उसे, तुम ओढ़ लो मुझे, परत दर परत, बनने लगो पर्वत !
एक रोज़ कभी, फिर झुलसेंगे हिमखंड, फिर कहीं वृष्टि,
कल कल छल छल, ये प्रवाह करेगा कटाव,
मैं फिर मांग लूंगी मेरे हिस्से की रेत ,
तुम फिर उधड़ोगे , उतनी ही परतों में,
और जीवन यूँ ही चलता रहेगा, सामानांतर किनारों सा, तुम्हारा भी, मेरा भी !
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तुम्हारी दीप्ति !

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ऋण ! आठवां पन्ना

मूल में, कभी आते,
या कभी प्रतीक्षा, रोष सीमान्त!
इतना ऋण कब , कहाँ और किस से ले लिया हमने
कि साथ बैठना भी चला जाता सूद में,
और बस हम भरते रहते किश्तें !
तभी तो किश्तों में ही होती बात कभी,
किश्तों में तुम आते कभी,
हज़ारों आगामी प्रश्न, और किश्त के, बोलो न के बाद कुछ नहीं
एक किश्त जितना समय, बचा कर रखा था तुमने भी
कि वो भी चला गया अदायगी में,
जब थाम बैठे मेरा चेहरा,फूल समझ, अपनी हथेलियों में !
उन्हीं किश्तों में, एक किश्त मेरी भी,
तुम्हें नज़र भर हँसते देखने की, तुम्हारे चुप हो जाने की!!
अब तो चाय भी भरने लगी थी हर्ज़ाने,
भुगतान में उबलती,
और मेरी फूंक, एक “नहीं” की किश्त में,
समेट लेती उफान!
तुम्हें कभी समझ आये तो बताना मुझे भी,
इतना ऋण कब , कहाँ और किस से ले लिया हमने!!
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तुम्हारी दीप्ति!!
#hindipoetry #tumharideepti #whatdoyoudodeepti

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एक नहीं, दो हो तुम !! सातवां पन्ना !

दो मुस्कुराहटें थीं तुम्हारी,
एक थी प्रफुल्लित, ढंगदार !!
और एक वो जो मैंने देखी थी, इस पहली वाली मुसकुराहट के पीछे , दुबकी, छुपी,
जब तुम कोशिश कर रहे थे मुस्कुराने की,
बावजूद, वो थी रिक्त, छलावे सी !
दो ह्रदय थे तुम्हारे
एक जो ठसाठस था, उफान था उसमें, उन्माद था,भावों का
और दूसरा वो, जिसे मैंने देखा था, इन सबसे विलग, मरुभूमि सा,
जो था जन शून्य,
रोड़े कोलतार की उस सड़क जैसा, जो भटक रही थी, उन तमाम मकानों दुकानों के ऐन बीच से,
जहाँ झड़ रहे थे कनेर, पीले चटख,
जो तप रही थी, जेठ की किसी दोपहर में,
और वो दोपहर भी, ठीक वैसी, जो है शेष तुम्हारी मेरी स्मृतियों में!
ऐसे ही तुम, हाँ एक नहीं दो थे तुम,
एक, जाड़े की रात, धधकते अलाव से, बचाते कितने प्राण, शीत से !
और दूसरे , गेंहूँ की बालियों, चटकती राई से,
जिसकी सरसराहट सुनने, न जाने कहाँ तक,
भागती चली गई थी मैं, हाथों में जज़्ब करती हर रेशे का स्पर्श,
फागुन में, इन्हीं बालियों सा तुम्हें, पकते देखा था,
और देखा था, उस चरम तक, जब तुम बाली से भूसा हो रहे थे !
हरे से सुनहरा होते खेत सी, तुम्हारी देह, हाँ, वो भी देखी थी मैंने,
और छोड़ दी थी एक जलती तीली उसमें, तुम्हें धुँआँ होने,
इस खेत को फिर से हरा होने !!
कभी तुम्हारा बने रहना, अर्थपूर्ण है मेरे लिए,
और कभी तुम्हें ध्वस्त कर देना, पराकाष्ठा है मेरी !
और इस तरह, एक नहीं, दो हो तुम मेरे लिए !!
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तुम्हारी दीप्ति !

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मैं लिखती रही तुम्हें !!

जिस स्ठान और स्थिति में तुम खड़े रहे जीवंत,
उसकी पीठ पर, बस क्षणिक संवेदन हीनता पीछे, होते तुम पाषाण
और बस पलक झपकने की देर जैसी, छोटी सी इकाई लांघकर,
बन सकते थे, बर्बर, वन्य!!
तूफ़ान समेटकर भी, सधे खड़े रहे, तुम बस इंसान थे,
और हर उस बार मैं लिखती रही तुम्हें, आत्मीयता की श्रेणी में !!
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दीप्ति
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कुछ भेज दिया

कभी कभी, कुछ होने के लिए,
व्यथित होना पड़ता है, विह्वलता लांघनी पड़ती हैं,
कभी ग्लानि से ह्रदय फटने को तैयार, और पीड़ाकारक,
बिना अपराध, अपराधभाव सर पर ढोने जैसा,
अदम्य साहस,कि अच्छा नहीं है, या क्या सोचोगे से ऊपर उठकर,
ऐसी एक ज़ुर्रत आज मैं भी कर बैठी,
कुछ भेज दिया मेरा लिखा, संपादक को !!
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दीप्ति

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